बिहार

पगडण्डियों के सहारे जीने को मजबूर, आजादी के 70 साल बाद भी नसीब नही हुई सड़के

पगडण्डियों के सहारे जीने को मजबूर, आजादी के 70 साल बाद भी नसीब नही हुई सड़के

विकास पुरुष को मुँह चिढ़ाता यह गांव, पगडण्डियों के सहारे जीने को मजबूर, आजादी के 70 साल बाद भी नसीब नही हुई सड़के

आरा(डिम्पल राय)। सूबे के मुखिया व विकास पुरुष कहे जाने वाले नीतीश कुमार ने सात निश्चय योजना की सुरुआत इस लिए किया था ताकि राज्य में पूर्ण विकास की व्यार चले। सात निश्चय योजना में हर गाँव को पक्की सड़क, नल-जल, अस्पताल समेत कई मूलभूत सुविधाओं का प्रावधान है। लेकिन भोजपुर जिला मुख्यालय से महज 20 किलोमीटर दूर बिहिया के फिनगी पंचायत के दुबौली गाँव में ये योजना दम तोड़ती हुई नजर आती है। यह गाँव मूलभूत सुविधाओं से कोसो दूर है। इस गाँव को आज तक एक पक्की सड़क नशीब नही हुई।

मुख्यमंत्री की सात निश्चय योजना को मुंह चिढ़ाते इस गांव में सड़क और अस्पताल जैसी जरूरी चीज लोगो को नशीब नही है।  मरीजो को खाट पर लाद कर खेत की पगडंडियों से होकर लोगो की जिंदगी गुजरती है। साथ ही सड़क मार्ग न होने से शादी विवाह में अड़चने आती है जिससे इस गाँव के लोग इस टापूनुमा गाँव मे रह कर किसी विकास पुरुष के आने का शायद इन्तेजार कर रहे है। आजादी के 70 वर्ष बीत जाने के बावजूद इस सड़क विहीन गाँव में लोग किसी तरह जीने को मजबूर हैं जो सरकारी दावों की पोल खोलता है। ऐसे में किसी मसहूर शायर की ये पंक्तिया याद आती है।“तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।’हजारों की आबादी से बसा यह गांव आज भी संसाधन के अभाव से जूझ रहा है। यहां के लोग जिल्लत भरी जिंदगी जीने को विवश हैं। सड़क विहीन इस गांव के लोगो की खेतों के पगडंडियों से आवागमन करना नियति बन गई है। स्थानीय लोगों ने बताया कि इस गाँव का सड़क मार्ग से नही जुड़ने के कारण युवक-युवतियां के शादी में अड़चनें आती है लोग पहले ही देख भाग जाते है कि जिस गाव में सड़क व अस्पताल न हो वाहा अपने बेटी की शादी नही करेंगे। बेटा हो या बेटी, उनकी शादी अच्छे परिवार में नही हो पाती है, जिसके चलते हमलोगों के अरमान इस गाँव में रहकर घुट कर रह जाते हैं। अगर किसी की तबियत खराब हो जाये चाहे वो गर्भवती महिलाएं, गंभीर पेशेंट हो या बृद्ध उसे अस्पताल तक पहुचाने के लिए खाट का सहारा लेना पड़ता है जिससे चार लोग अपने कंधों पर खेत के पगडंडियों से होकर कई किलोमीटर पैदल सफर कर अस्पताल लेकर जाते है। इस बीच मे मरीज की जान भी चली जाती है। छोटे छोटे बच्चे खेत के पगडंडियों से होकर कई किलोमीटर चल कर स्कूल जाते है। सड़क नही होने से गाव में नाही एम्बुलेंस पहुच पाती है और ना ही स्कूल बस।

दरवाजे तक चार पहिया वाहन की बात तो दूर दुपहिया वाहन भी दरवाजे तक नहीं पहुँच पाता है। ऐसे पिछड़े गांव की पदाधिकारी भी सुधि लेने नहीं पहुंचते हैं। भले ही सरकार व स्थानीय प्रशासन सुशासन की बात करता हो, लेकिन इस गांव की स्थिति यह दर्शाती है कि विकास तो दूर गांव में आवागमन तक के रास्ते नहीं होना सरकार के द्वारा चलाये जा रहे योजनाये इस गाँव के लोगो पर जले पर नमक का काम करता है। विकास के नाम पर इस गाव को सिर्फ 2011 में बिजली मिली जो लालटेन युग से छुटकारा  दिला पाई है। लेकिन सड़क की कमी ज्यादा ही खलती है। शुद्ध पेयजल, चापाकल, शौचालय, आंगनबाड़ी केंद्र, जैसी कई सुविधाए आज भी इस गाँव के लोगो को नशीब नही हो पाई। वर्षा के दिनों में लोगो की मुशीबत और बढ़ जाती है जब नदी के पानी अपने चरम उफान पर होती है चारो ओर पानी ही पानी दिखाई देता है लोगो को घर से निकलना दूभर हो जाता है। ग्रामीणों ने बताया कि आजादी के 70 बसंत बीत जाने के बाद भी टापूनुमा इस गांव का विकास संभव नही हो पाया। कुसुम कुमारी देवी व सिद्धनाथ ओझा ने बताया कि कुछ दिन पहले मेरे घर बारात आई थी अचानक तेज हवा के साथ बारिश शुरू हो गई  बारिश के बजह से चारो ओर कीचड़ हो गए बारात मुख्य मार्ग से गाव तक नही आ पाई जिसके कारण दरवाजा पर बैंड बाजा समेत बाराती नही आ सके गाव के लोग आस पास के लोग खाना खाने नही आ सके दूल्हे को किसी तरह गोद मे उठाकर दरवाजे तक पहुचाया गया तब जाकर शादी हुई शादी के तीसरे दिन बेटी की बिदाई हुई जब कीचड़ सुख गए। जिससे समान बर्वाद होने के अलावा जो शौक मन मे पाले थे वो धरे के धरे रह गए।जनप्रतिनिधि वह नेतागण चुनाव के समय ही इस क्षेत्र में दिखते हैं, तथा बड़े-बड़े वादे कर निकल जाते हैं।  चुनाव आते ही नेताओं के द्वारा लम्बे-चौड़े वादे कर चुनाव जीतने के बाद लौटकर देखना कोई नेता मुनासिब नही समझते हैं। ना ही सरकारी आलाधिकारी की नजर इस गांव की ओर पड़ी है। ग्रामीणों ने कहा कि अगर अब चुनाव से पहले सड़क नहींं बनता है तो हम लोग चुनाव का बहिष्कार करेंगे, यानी पहले रोड तब वोट।

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