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2. धूं धूं कर दहक रहा 3 . मुझको दीवाना कह लो—– डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

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2. धूं धूं कर दहक रहा
तेरी याद जीने नहीं देती
दायित्वों का ख्याल मरने नहीं देता
जिस्म पर निशान हलके फुल्के लगते हैं

अंतरमन धूं धूं कर दहक रहा है |
तेरा यूँ जाना क्या जरूरी है
चीजो को सम्हलने में व़क्त लगता है
अगर तुझे लगता है कि देर हो गयी है तो तू गलत है
हर देर नई शुरुआत बना दूंगा |
प्यार की परीक्षा हमेश ही कठिन होती है
सो हमेशा से लड़ रहा हूँ |

3 . मुझको दीवाना कह लो
तुम्हे प्यार नहीं तो क्या
मुझको दीवाना कह लो
उम्मीदे वफ़ा नहीं तो क्या
मुझको दीवाना कह लो |
धूं धूं जलते अंतर्मन में
प्राण अभी बाकी रह गये
अस्तित्व बिखरने को था
ठोकर खाकर सम्हल गये |
दे जाती हो मृगतृष्णा तो क्या
मुझको दीवाना कह लो
नित्य प्रतीक्षा व्यर्थ तो क्या
मुझको दीवाना कह लो |
संघर्ष जीवन में कम नहीं
छोटी छोटी खुशियां बटोर लो
सुख दुःख के साथी हैं मुश्किल
जो मिला उसी में प्रेम टटोल लो |
तेरा आना भ्रम तो क्या
मुझको दीवाना कह लो
तुम्हे प्यार नहीं तो क्या
मुझको दीवाना कह लो |
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

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