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4. आ जाती हैं कुछ यादें—5. इंसान की तरह जीता हूँ– डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

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4.
आ जाती हैं कुछ यादें
धूल की पर्तों के नीचे तस्वीरों में अहसास जगाती हुई
ख़्वाहिशें कांधे पे लिए कुछ इठलाती हुईं
आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं ।
चढ़ती हुई जवानी में फ़ितरतन नगमे गुनगुनाती हुई
बेशर्मी में मुस्कुराते, गले लगते शर्माती हुई
आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं ।
चादर पे जुम्बिशें रात चांदनी जाती हुई,
शोख़ नखरे, बलखाती, हसरतें दौड़ाती हुईं
आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं।
नजर उठा के देखो तो बेचैन कर जाती हुई
हवा के रुख पे जज़्बात सजाती हुई,
आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं।

5.
इंसान की तरह जीता हूँ
हालात के मारे हार जाता हूँ कई बार
फिर भी खड़ा हो जाता हूँ हर बार, बार बार
इंसान हूँ, इंसान की तरह जीता हूँ
टूटा हुआ पत्थर नहीं जो फिर ना जुड़ पाऊँगा ।
तेज धूप के बाद ढलती हुई साँझ
आती जाती देख रहा बरसों से
इसी लिए चुन लेता हूँ हर बार नये
नहीं होता निराश टूटे सपनो से ।
क्या हुआ जो पत-झड़ में
तिनके सारे बिखर गये
चुन चुनके तिनके हर बार
नीड नया बनाऊँगा।
इंसान हूँ, इंसान की तरह जीता हूँ
टूटा हुआ पत्थर नहीं जो फिर ना जुड़ पाऊँगा।

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

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