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6. बेर का पेड़ — डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

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बेर का पेड़
आज जब मैंने
अपने कमरे की खिड़की खोली तो
दूर कोने पर
मुझे बेर का पेड़ दिखाई दिया
कुछ वाक़्यात
फ़ौरन ही जेहन में उतर आये
मेरा बेर तोडना
तोड़े हुए बेरों को
ललचाकर देखना
बेरो को मुंह से काटना, कि
उनमे कीड़े-इल्लियाँ दिखाई देना
कई बार ऐसा होने पर
मेरा झुंझला जाना
फिर मीठे – मीठे बेरों के बीच
मेरी झुंझलाहट ख़त्म हो जाना
आज मुझे यकीं हो गया है, कि
ये बेर का पेड़
मेरी यादों में
एक यादगार हिस्सा बन गया है।

——————-एक परिचय—–डॉ.रूपेश जैन———————

बुंदेलखंड के शहर टीकमगढ़ में डॉ.रूपेश जैन का जन्म हुआ | टीकमगढ़ में प्रारंभिक शिक्षा लेकर आगे की पढ़ाई के लिये इन्होने डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में दाखिला लिया | इनकी रचना काल की शुरुआत विद्यालय से हुई लेकिन विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान साहित्य के प्रति वास्तविक अभिरुचि बढी|

डॉ हरिसिंह उत्सव (२५ दिसम्बर २००४) के अवसर पर संस्थापक डॉ. हरीसिंह गौर को समर्पित पुस्तक “श्रद्धा सुमन” प्रकाशित हुई| वर्तमान में साहित्य में रूचि रखते, एक फार्मास्यूटिकल कंपनी में कार्यरत है|

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